रिक्त अब शेष नहीं

रिक्त अब शेष नहीं

वह पहला स्थान, तुम्हें ना अब दे पाऊंगीमाफ करना ऐ चांद, रिक्त अब शेष नहींरोम रोम का हर एक कोनाउसकी चमक ,दमक,धमक ,धुन से भरा हुआ हैकिसी की हो चुकी ऐ चांद तुम्हारी न बनपाऊंगी ,रिक्त अब शेष नहीं की स्थान तुम्हें दे पाऊंगी,ऐ चांद छलावा ही समझना तुमसे मेरा प्रेम पर उससे सच्चा है जो…

हींग लगे ना फिटकरी..

हींग लगे ना फिटकरी..

भारतीय प्रायद्वीप में शिक्षा संस्थानों के इतिहास की जब बात आती है तो सबसे पहले तक्षशिला और नालंदा जैसे शिक्षा संस्थान का जिक्र आता है। थोड़ा विस्तार से अगर जानना चाहेंगे तो नालंदा के साथ-साथ विक्रमशिला. तिलाधक, ओदंतपुरी और कुछ अन्य विश्व प्रसिद्ध शिक्षा संस्थानो का जिक्र भी आपको महान मगध साम्राज्य के इतिहास में…

MAHAMARI SE UTHAL PUTHAL

MAHAMARI SE UTHAL PUTHAL

4- इस महामारी के भयानक दौर में रचनाकार क्या और कैसा रच रहे हैं ? खासकर चित्रकारों ने कुछ  ऐसा नया किया है जिसके बारे में कोई बात हो सकती है? इस परिप्रेक्ष्य में कि 1943 के अकाल की  आपदा पर चित्रकार जैनुल आबेदीन ने ऐतिहासिक चित्र बनाए थे जिनकी काफी चर्चा रही है। महामारी…

“प”

“प”

तुम्हारे सुरों में“प”की कमी है,शायद।।“म” के बाद ध’ से पहले,कुछ रह गया,है शायद।“प”“मै भी ठहर गई थी शायद,बिन पुछे,बिन बुलायेकैसे आ जाऊँ!!चाहती तो थी,तेरी कमी को पूरा कर जाऊँ!!पर सोचा करती हूँ,तुमने ही कहातुम्हें पूरा पूरा कभी नहीं चाहिए !यंकिं जानो,सिर्फ़ मेरे ना होने से तुमहारे ख़ज़ाने मे ,तुम कंगाल हो,मेरे ना होने से तुमहारे…

देवालय

देवालय

संसार भर में जितने देवालय हैं , वे सभी प्राथमिक रूप से देवताओं और भक्तों के मिलन स्थल रहे हैं। निर्धारित दिनों या त्योहारों में लोग यहाँ बड़ी संख्या में जुटते हैं मगर, साधारण दिनों में यहाँ सन्नाटा भी नहीं रहता। धर्म कोई भी हो , देवालयों का निर्माण न केवल एक धर्म विशेष को…

आस में बैठी

आस में बैठी

आज जाने क्या बात हुईकभी मैंने कभी तुमने याद कियासिल-सिला कुछ बन ना पायाआज जाने क्या बात हुईखिड़की के बाहर झांकते कब शाम ढलीअंधेरे ने दी दसतक, खामोश जुगनूओं की हंसी,कभी मैंने कभी तुमने याद कियाहवा हसते कह निकली तु कब झुमेगी?नदी कहते बह निकली,,तु कब बहेगी?बारिश भी अब पिछे कयुँ रहतीकब बरसोगी पुछ आगे…

व्यथा

व्यथा

हे सखी साथ छोड़ जा रहीमैं फिर भई सन्यासी अब केआजीवन को सन्यासी पलकें निसप्राण भईराह दिखे अब धुंधली सीसपने सारे टूट गएअब आस नहीं उनके आवन कीहे सखी ..वह छोड़ गये यूं कह हर बार ,आएगें लौट फिर एक बार….का से कहूं व्यथा हे सखी मैं फिर भई सन्यासीअब के आजीवन को सन्यासी कित जाऊं…

श्रृंगार

श्रृंगार

       श्रृंगार         *******          श्रृंगार किये नवलखा भी पहनामेंहदी रचा ,चुड़ियाँ भर के हाथों में ,माँगटिका, बिंदी माथे पे सजाई           आईने में झाँका जो उसमे फिर भी खालीपन ही पाईपुछती थी पगली सी आईनें से       अब कौन सा श्रृंगार करूँ         खाली-खाली इस खाली पन कोअब किस श्रृंगार से भरूँहोगई अब कोरी मैं तो कुछ नहीं है मेरा     किया…

कालजयी उपन्यास ‘ त्यागपत्र ‘ के आवरण पर मेरा चित्र

कालजयी उपन्यास ‘ त्यागपत्र ‘ के आवरण पर मेरा चित्र

महान कला से मिलना संयोग नहीं होता,आपको पात्र बनना पड़ता है, वह भी खाली। सौभाग्य की बात है कि आधुनिक हिंदी साहित्य में प्रेमचन्द के बाद सबसे बड़े कथाकार जैनेंद्र कुमार जी द्वारा 1936 में लिखित ‘त्यागपत्र’ उपन्यास पढ़ने का मौका मिला। यह उपन्यास अपने संक्षिप्त कलेवर में पचासी सालों के बाद भी हिंदी ही…