श्रृंगार

       श्रृंगार
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          श्रृंगार किये नवलखा भी पहना
मेंहदी रचा ,चुड़ियाँ भर के हाथों में ,
माँगटिका, बिंदी माथे पे सजाई
           आईने में झाँका जो उसमे फिर भी खालीपन ही पाई
पुछती थी पगली सी आईनें से
       अब कौन सा श्रृंगार करूँ
         खाली-खाली इस खाली पन कोअब किस श्रृंगार से भरूँ
होगई अब कोरी मैं तो कुछ नहीं है मेरा
     किया जो श्रृंगार, वह भी शायद नहीं था मेरा
जितना भरतीं , उतनी खाली हो जातीं हूँ
फिर कोरी और कोरी खाली ही रह जातीं हूँ

 प्रियंका सिन्हा

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