देवालय

संसार भर में जितने देवालय हैं , वे सभी प्राथमिक रूप से देवताओं और भक्तों के मिलन स्थल रहे हैं। निर्धारित दिनों या त्योहारों में लोग यहाँ बड़ी संख्या में जुटते हैं मगर, साधारण दिनों में यहाँ सन्नाटा भी नहीं रहता। धर्म कोई भी हो , देवालयों का निर्माण न केवल एक धर्म विशेष को मानने वाले लोगों का सामूहिक आराधना स्थल के रूप में हुआ बल्कि अन्य धर्मों को मानने वालों से एक दूरी और भिन्नता बनाये रखने पर भी विशेष ध्यान रखा गया। विभिन्न धर्मों के देवालयों के स्थापत्य , उनमें इस्तेमाल किये गए रंग, पूजा पद्धति, प्रसाद , प्रार्थना संगीत में इस्तेमाल होने वाले वाद्य यंत्र, पुरोहितों की वेषभूषा आदि , ये सब उसी भिन्नता को बनाये रखने के लिए हज़ारों वर्षों से होता आया है। इन देवालयों को , मूलतः या तो बनाने वाले शासक या धनी के नाम से या फिर इसमें आराध्य देवता नाम से जाना जाता है। इनको बनाने वाले मूर्तिकारों या वास्तुकारों का उल्लेख कहीं नहीं होता और इसलिये किसी देवालय की प्रसिद्धि किसी वास्तुकार या मूर्तिकार की एक कलाकृति के रूप में नहीं होती है । मगर, स्पेन के बार्सिलोना शहर में बना ‘फॅमिलिया सेग्रादा बेसिलिका’ नाम का रोमन कैथोलिक देवालय , इस परंपरा का एक अनूठा व्यतिक्रम है। यह भव्य भवन चर्च या गिरजा न होकर, एक बेसिलिका है। ( बेसिलिका मूलतः ईसा पूर्व रोमन साम्राज्य में विशाल सार्वजनिक भवन को कहा जाता था , जिसका प्रयोग विविध कामों के लिए किया जाता था। बाद में गिरजों के साथ, इन बेसेलिकाओं का भी उपयोग धार्मिक कार्यकलापों के लिए किया जाने लगा लेकिन , अपने मूल अर्थ में ये गिरजा या चर्च से भिन्न होते हैं। ) ‘फॅमिलिया सेग्रादा बेसिलिका’ का निर्माण हालाँकि 1882 में शुरू हुआ था, मगर यह भवन आज भी निर्माणाधीन है। आज के स्पेन के बार्सिलोना शहर में रहने वाला, शायद ही कोई स्पेनी व्यक्ति ऐसा मिले , जिसे फॅमिलिया सेग्रादा के वास्तुकार अंटोनी गावडी (1852-1926) पर फक्र न हो। पूरे बार्सिलोना शहर में गावडी की कृतियों फैली हुई हैं। बड़े बड़े भवनों , पार्कों , फव्वारों, दुकानों से लेकर राहगीरों के लिए सड़क किनारे विश्राम के लिए बने कॉन्क्रीट के बेंचों तक में अंटोनी गावडी की रचनात्मकता को देखा जा सकता है। ये मानो किसी महानगर के शरीर पर उकेरे हुए किसी कलाकार का हस्ताक्षर हों जो अपने गहनों जैसी खूबसूरती और विशिष्टता के चलते एक शहर की पहचान बन गया है और जिसके कारण बार्सिलोना यूरोप के दूसरे शहरों से बिलकुल अलग लगता है । अंटोनी गावडी के मृत्यु के लगभग सौ वर्ष बीत चुके हैं , जाहिर है आज ऐसा कोई भी नहीं है जिसने उन्हें देखा हो , फिर भी तमाम लोग हैं जो अपने को गावडी के भक्त या अनुयायी मानते हुए अपने को ‘गावडियन’ भी कहते हैं। किसी कलाकार के प्रति आम जनता के ऐसा प्रेम और सम्मान, इतिहास में विरल है। अपनी समूची जिंदगी में ढेरों नायाब रचनाओं के बावजूद अंटोनी गावडी को उसके सबसे महत्वाकांक्षी कृति ‘ फॅमिलिया सेग्रादा बेसेलिका’ ( चित्र 1) के लिए विशेष रूप से याद किया जाता है , जबकि यह उनकी एक असम्पूर्ण कृति है । गावडी के मृत्यु 1926 में एक सड़क दुर्घटना में हुई थी। फॅमिलिया सेग्रादा के गर्भ गृह में ही बनी उनकी समाधि , मानों कृति और कृतिकार के बीच के अनश्वर रिश्ते का प्रतीक हो ।1883 में गावडी को इस भवन के प्रमुख वास्तुकार बनाया गया था जिसे वे अपने जीवन के अंतिम समय तक इस काम से जुड़े रहे। 1926 में उनकी मृत्यु के बाद जब फॅमिलिया सेग्रादा का निर्माण का केवल 15 से 25 प्रतिशत काम ही हो सका था। कई वर्षों तक निर्माण कार्य रुके रहने के बाद 1936 के जुलाई महीने में स्पेन में गृह युद्ध छिड़ गया। क्रांतिकारियों ने निर्माणाधीन भवन के तहखाने में , जहाँ गावडी के बनाये तमाम नक्शे और मॉडल रखे थे ; आग लगा दिया। इस आक्रमण से भवन निर्माण की प्रक्रिया को बहुत बड़ा धक्का लगा और गृह युद्ध के बाद फॅमिलिया सेग्रादा का काम शुरू होने में एक लम्बा समय लग गया। फॅमिलिया सेग्रादा के बाहरी सतहों को गावडी ने तीन प्रमुख हिस्सों में कल्पना की थी जिसमें पहला, ‘नेटिविटी फसाड’ था । दूसरा था ‘ग्लोरी फसाड’ , जो अब भी निर्माणाधीन है। और , तीसरा था ‘ पैशन फसाड’ जिसे स्पेन के विश्वविख्यात वास्तुकात-मूर्तिकार जोसेप मारिया सुबिराख (1927 -2014) ने बनाया बनाया था। नेटिविटी फसाद की कल्पना , जहाँ गावडी ने गोथिक शैली ( 12 वीं से 16 वीं शताब्दी के बीच यूरोप के विशिष्ट भवन निर्माण शैली) को आधुनिक ज्यामितीय शैली में बनाया था। लम्बे समय तक फॅमिलिया सेग्रादा का निर्माण काम धीमी गति से चलते रहने के बाद 1986 में इसको पूरा करने की ज़िम्मेदारी जोसेप मारिया सुबिराख को दी गयी थी। एक वास्तुकार और मूर्तिकार के रूप में तब तक सुबिराख विश्व विख्यात हो चुके थे। सुबिराख , गावडी के बहुत बड़े प्रसंशक थे और अपने को गावडी के अनुयायी मानते थे। गावडी जैसे महान और लोकप्रिय वास्तुकार के अधूरे काम को पूरा करने की ज़िम्मेदारी कितनी चुनौतीपूर्ण थी, इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। लेकिन, किसी भी कलाकार का अस्तित्त्व किसी अन्य कलाकार की कला का नक़ल या अनुसरण करने में नहीं होता बल्कि अपनी रचना की मौलिकता ही उसे सही अर्थों में ‘रचनाकार’ होने की स्वीकृति देता है। फॅमिलिया सेग्रादा के बाहरी सतह के दोनों हिस्सों को ( नेटिविटी फसाड और पैशन फसाड ) देखते हुए हम इस बात को बेहतर ढंग से समझ पाते हैं। नेटिविटी फसाड की संरचना , ईसा मसीह के जन्म सम्बन्धी घटनाओं पर आधारित मूर्तियों से सुसज्जित है। नेटिविटी फसाड का निर्माण 1935 में शुरू हुए गृह युद्ध के पहले ही अंटोनी गावडी की योजना के अनुसार पूरा हो चुका था। नेटिविटी फसाड की मूर्तियों में यूरोपीय धार्मिक मूर्तियों की यथार्थवादी परंपरा साफ़ दिखाई देती है (देखें चित्र 2 ,3 और 4)। यहाँ ग़ौरतलब है, कि यूरोप के गिरजा घरों की मूर्तियों का विशाल हिस्सा , यथार्थवादी मूर्ति कला के उत्कृष्ट उदाहरण रहें हैं।जोसेप मारिया सुबिराख ने इस चुनौती को स्वीकारते हुए पैशन फसाड की मूर्तियों का निर्माण किया था ।सुबिरख की बनाई मूर्तियों की , स्पेन ही नहीं बल्कि विश्व भर के तमाम लोगों ने तीव्र आलोचना की और उस पर गावडी की परिकल्पना की उपेक्षा करने का आरोप लगाया । नेटिविटी फसाद की मूर्तियों में जहाँ परंपरा का अनुकरण है , वहीं पैशन फसाड में सुबिराख ने परंपरा को तोड़ते हुए एक नयी शैली की नींव रखी है। इन मूर्तियों को देखते हुए उन दर्शकों को , जो ईसा मसीह के जीवन की कथाओं को जानते हैं ; परिचित कथा को ‘खोज पाने’ का आनंद मिलता है।मगर जो ईसा की कथाओं से अपरिचित हैं , उनके लिए ये मूर्तियां किसी कला दीर्घा में सज्जित मौलिक मूर्तियों की एक अभिनव प्रदर्शनी सी लगती है। इन मूर्तियों में सुबिराख ने पत्थर के कठोर और भारीपन को कोमल यथार्थवादी आकृतियों में तराशने के बजाय पत्थर के मूल चरित्र को बरकरार रखते हुए मूर्तियों को रचा ( देखें चित्र 5,6 , और 7)। इसलिए जहाँ गावडी की मूर्तियों में मोम की कोमलता है, तो सुबिराख की मूर्तियों में पत्थर की कठोरता है। सुबिराख ने इस कठोरता को, मूर्तियों की सतह को खुरदरा बना कर और भी बढ़ा दिया है , साथ ही इनकी संरचना में भारीपन को बनाये रखा है। बावजूद इसके , मूर्तियों में उकेरे गए लोगों के मनोभावों को बेहद प्रभावशाली ढंग से दिखाया भी है। फॅमिलिया सेग्रादा बेसिलिका , न केवल वास्तुकला और मूर्ति कला के संश्लेषण का एक नायाब मिसाल है ; यह कला में मौलिक और सृजनशील होने के सुबिराख सरीखे कलाकार के साहस का एक अपूर्व आख्यान है। यह सच है , कि अंटोनी गावडी की प्रतिभा के साथ हम जोसेप मारिया सुबिराख की तुलना नहीं कर सकते। लेकिन, फमिल्या सेग्रादा की मूर्तियों में यदि हमें परम्परा से मुक्त होने के प्रयास के साथ साथ सृजनशीलता और मौलिकता को समझना हो तो हमें पैशन फसाड के सामने खड़ा होना होगा, जहाँ हम शायद सुबिराख होने के अर्थ को भी समझ सकेंगे।

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